Sunday, April 19th, 2026

901 कलशों का अनोखा उत्सव: देर रात रेल ट्रैक पर थमे ट्रेन के पहिए

डोंगरगढ़

शारदीय नवरात्र के समापन पर मां बम्लेश्वरी मंदिर से देर रात एक भव्य शोभायात्रा निकली। इस शोभायात्रा में महिलाएं सिर पर ज्योति कलश लिए मां की जयकारों के साथ आगे बढ़ी। कुल 901 प्रज्वलित कलशों का महावीर तालाब में विसर्जन किया गया। यह अनूठा दृश्य देखने के लिए हजारों श्रद्धालु डोंगरगढ़ पहुंचे और तालाब किनारे आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला।

डोंगरगढ़ की यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक धरोहर भी मानी जाती है। विसर्जन यात्रा मंदिर से शुरू होकर छिन्नमस्तिका मंदिर होते हुए रेलवे ट्रैक पार कर मां शीतला मंदिर पहुंची। यहां मां शीतला और मां बम्लेश्वरी के माई ज्योत का मिलन करवाया गया, जो इस पूरे अनुष्ठान की विशेषता है।

सबसे खास और अनोखी परंपरा यह है कि इस विसर्जन यात्रा के मार्ग में मुंबई–हावड़ा मुख्य रेलवे लाइन आती है। विसर्जन के दौरान रेल यातायात पूरी तरह थम जाता है। भारतीय रेलवे दोनों ओर से आने वाली गाड़ियों को रोक दिया जाता है। लगभग तीन से चार घंटे तक इस व्यस्त रेलखंड पर मेगा ब्लॉक रहता है। आस्था और परंपरा के इस संगम के आगे आज भी रेलों के पहिए रुक जाते हैं। इस परंपरा की नींव रियासत काल में रखी गई थी।

रियासत काल से चली आ रही परंपरा
खैरागढ़ के तत्कालीन शासक राजा लाल उमराव सिंह ने 21 अगस्त 1883 को ब्रिटिश सरकार और बंगाल-नागपुर रेलवे के साथ एक समझौता किया था, जिसके तहत रेल लाइन निर्माण के लिए जमीन और न्यायिक अधिकार सौंपे गए। इस समझौते के दस्तावेज (deeds) में डोंगरगढ़ का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि राजा लाल उमराव सिंह ने जमीन देने के साथ ही डोंगरगढ़ स्टेशन में रेलों के ठहराव और नवरात्र के समय ज्योति विसर्जन यात्रा के लिए रेल पटरियों पर ब्लॉक देने की शर्त भी रखी थी। इसी परंपरा का असर आज भी जीवित है, जब रेलवे नवरात्र की इस परंपरा के सम्मान में ट्रेनों को रोक देता है। डोंगरगढ़ की नवरात्रि का यह विसर्जन सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और आस्था का ऐसा संगम है, जिसने देशभर के श्रद्धालुओं को दशकों से अपनी ओर आकर्षित किया है।

 

#901 Jyoti Kalash#Train

Source : Agency

आपकी राय

12 + 2 =

पाठको की राय